शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

अमिताभ का ख़त नातिन नव्या और पोती आराध्या के नाम

पिछले दिनों ऐश्वर्या राय की अगली फिल्म 'ऐ दिल है मुश्किल' के टीज़र लॉन्च के बाद कुछ इस तरह की खबरें मीडिया में छाई रहीं कि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में रणबीर कपूर के साथ अपनी बहू के हॉट सीन को देख नाराज हैं। हालांकि, यह बात कितनी सही है और कितनी गलत, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन अब अमिताभ ने अपने खानदान की बेटियों के लिए कुछ ऐसे शब्द लिखे हैं, जो उन्हें बेझिझक आगे बढ़ने और अपने दम पर जिंदगी जीने के लिए प्रेरणास्रोत साबित होंगे।
तुम दोनों के नाजुक कंधों पर बेहद अहम विरासत की जिम्मेदारी है। आराध्या, अपने परदादा जी डॉ. हरिवंश राय बच्चन और नव्या अपने परदादा जी श्री एच.पी. नंदा की विरासत संभाल रही हैं। तुम दोनों के परदादा जी ने तुम्हें मौजूदा सरनेम दिया है, ताकि तुमलोग इस प्रतिष्ठा, उपाधि और सम्मान को सेलिब्रेट कर सको। तुम दोनों भले ही नंदा या बच्चन हो, लेकिन तुमदोनों लड़की हो...महिला हो! और चूंकि तुमलोग महिला हो इसलिए लोग अपनी सोच, अपना दायरा तुम पर थोपने की कोशिश करेंगे। वे तुमसे कहेंगे कि तुम्हें कैसे कपड़े पहनने चाहिए, कैसा व्यवहार करना चाहिए, किससे मिलना है और कहां जाना है। लोगों की धारणाओं में दबकर न रहना। अपने विवेक के बल पर अपने फैसले खुद करना। किसी को यह तय करने का हक न देना कि तुम्हारी स्कर्ट की लंबाई तुम्हारे कैरक्टर का पैमाना है। किसी को यह सलाह देने की अनुमति मत देना कि कौन तुम्हारे दोस्त होने चाहिए और तुम्हें किन लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए। किसी और वजह से शादी करने की जरूरत नहीं जबतक कि तुम खुद शादी के लिए तैयार न हो। लोग बातें करेंगे। वे काफी बेकार बातें करेंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हें हर किसी की बातें सुननी है। कभी भी इन बातों से परेशान न होना कि लोग क्या कहेंगे। आखिरकार सिर्फ तुम दोनों ही ऐसी हो, जिन्हें अपने किसी भी काम का नतीजा झेलना पड़ेगा, इसलिए किसी दूसरे को तुम्हारे लिए फैसला लेने का हक मत देना। नव्या- तुम्हारा नाम, तुम्हारे सरनेम की खासियत तुम्हारी उन मुश्किलों से नहीं बचाएगी, जो महिला होने की वजह से तुम्हारे सामने आएंगी। आराध्या- समय के साथ तुम इन चीजों को समझोगी। हो सकता है कि तब मैं तुम्हारे आसपास न रहूं, लेकिन मुझे लगता है कि जो कुछ आज मैं कह रहा हूं उस वक्त भी तुम्हारे लिए प्रासंगिक (उचित) रहेगा। यह मुश्किल हो सकता है, एक महिला के लिए यह दुनिया मुश्किल हो सकती है, लेकिन मेरा यकीन है कि तु्म्हारी जैसी महिलाएं इन चीजों को बदल सकती हैं। अपनी सीमाएं खींच पाना, अपनी पसंद रखना, दूसरों को फैसले से ऊपर उठकर सोचना भले ही आसान न हो, लेकिन तुम!...तुम हर जगह महिलाओं के लिए एक उदाहरण बन सकती हो। ऐसा ही करना और जितना मैंने अबतक किया है तुमलोग उससे कहीं ज्यादा करोगी और मेरे लिए सम्मान की बात होगी कि मैं अमिताभ बच्चन के नाम से नहीं, बल्कि तुम्हारे दादा और नाना के रूप में जाना जाऊं।

प्यार और स्नेह के साथ
तुम्हारे दादा जी और नाना जी

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

मंत्री संदीप कुमार को गलत कहने से पहले 'रूस्तम' फिल्म देख आएं...


Anil Dwivedi 

आप नेता और महिला बाल विकास मंत्री संदीप कुमार की आई ताजा सेक्स-सीडी पर अजीब से तर्क उठे हैं. सोशल मीडिया पर कईयों को इसमें कुछ भी गलत नही दिख रहा. ऐसे लोग सबसे पहले 'रूस्तम' फिल्म देख आएं. हो सकता है उनकी अक्ल के बंद पडे ताले खुल जाएं. और जो फिल्म नही देख सकते, वे रामायण के उस उत्तरकाण्ड युदधकाण्ड को पढ लें जिनकी धमनियों में यह धार्मिक पुस्तक पीढी दर पीढी रचती-बसती आ रही है. रूस्तम फिलम में एक नौसेना का आॅफिसर अपनी पत्नी के धो खे से इस कदर व्यथित है कि वह अपनी पत्नी के साथ अंतरंग संबंध बनाने वाले ब्वॉयफ्रेण्ड की हत्या तक कर देता है. समाज जानता है कि रूस्तम ने हत्या की है मगर चूंकि उसकी नजर में ये संबंध अनैतिक और अपराध जैसा है, पति को धोखा देने की तरह है, इसलिए उसने रूस्तम के कदम को सही बताया. 
एक पत्नी या पति के होते हुए दूसरे से नाजायज संबंध रखना, सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं, उस अमरीका में भी अस्वीकार्य रहा है जहां यौन संबंधों की मुक्त वकालत होती है. याद कीजिये अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लेंविंसकी के बीच के अवैध संबंधों को- कोई सीडी या फोटो सामने नही आए थे. मोनिका ने एफआईआर तक नहीं की थी मगर नैतिकता के पायदान से गिरकर अमरीकी राष्ट्रपति जैसे पद की जो किरकिरी हुई, उसी से व्यथित होकर क्लिंटन ने सार्वजनिक तौर पर अपनी पत्नी और अमरीकी समाज से माफी मांगी थी. अब आइए रामायण के उत्तरकाण्ड पर. सिर्फ राजा की मर्यादा की रक्षा के लिए, लोकोपवाद से बचने के लिए राम ने सीता का परित्याग किया. पहली बार सीता ने अगिनपरीक्षा दी क्योंकि उनके चरित्र पर संदेह उनके पति राम ने जताया था. तब सीता ने यह कहते हुए अग्नि में प्रवेश किया कि अगर मेरा चरित्र शुदध हो तो अगिनदेव मेरी रक्षा करें और सीता माता परीक्षा में खरी होकर वापस लौटी थीं. दुबारा जब इसी समाज ने सीता के चरित्र पर उंगलियां उठाईं तो सीताजी ने कोई परीक्षा नही दी. उन्होंने सीधे धरती को पुकारा और उसमें समा गईं. सवाल है सीता माता वापस क्यों नही लौटी? वाल्मीकि यहां स्पष्ट करते हैं कि चूंकि पहली बार उनके पति ने शक जताया था अत: खुद को पवित्र साबित करना, पत्नी यानि सीता की जिम्मेदारी थी लेकिन जब दूसरी बार समाज ने चरित्रहीन होने की आशंका जताई तो सीता को बचाने की जिम्मेदारी उनके पति यानि भगवान राम की थी लेकिन राम चुप रहे. उनके सामने दो ही विकल्प थे. पहला वे सीता को साथ रखते और राजपाट छोड देते और दूसरा सीता को छोडकर राजपाट संभाले रहते. एक राजा की पहली जिम्मेदारी अपनी प्रजा यानि समाज की चिंता है इसलिए उन्होंने सीता को त्याज्य दिया. हो सकता है एक राजा के तौर पर भगवान राम को महज यह भय था कि अगर उन्होंने सीता का पक्ष लिया तो कहीे पूरी प्रजा ही दुराचारी ना हो जाए इसलिए भगवान राम ने सीता का परित्याग किया. इसीलिए कलियुग में हर राजनीतिक दल इसी परिपाटी को आगे बढा रहा है. भाजपा से संजय जोशी, राघव महाराज, कांग्रेस से अभिषेक मनु सिंघवी या मदेरणा जैसों को तुरंत निष्कासित किया गया क्योंकि ये सब राजा यानि मंत्री, प्रवक्ता इत्यादि पदों पर थे जो कि सार्वजनिक नैतिकता के धरातल पर हमेशा पाक साफ होने चाहिए और दिखने भी चाहिए.

कोई काम छोटा नहीं होता आदमी छोटा-बड़ा होता

 - Vikas Mishra


ये शुक्ला जी हैं। जिस सोसाइटी में रहता हूं, उसमें ये प्लंबर का काम करते हैं। दाढ़ी, मूंछ, बाल सब सफेद हो चुके हैं, लाइट कलर के कपड़े पहनते हैं, माथे पर चंदन लगाते हैं और बड़ी लगन से अपना काम करते हैं। उम्र 60 पार कर गई, लेकिन जब भी देखो, पूरी तरह प्रसन्न नजर आते हैं। हैं उस पूर्वी उत्तर प्रदेश से, जहां ब्राह्मण परिवारों के नौजवान- ये काम मेरा नहीं है.... अब मेरे ये दिन आ गए, जो मैं ये काम करूंगा..? जैसे फिजूल के सवालों में उलझे हैं, उनके लिए शुक्ला जी आदर्श की तरह खड़े हैं।

शुक्ला जी गोंडा के रहने वाले हैं, आईटीआई की पढ़ाई की थी। बड़े भाइयों से झगड़ा हुआ, भाग आए दिल्ली। पेचकस, प्लास, छेनी- हथौड़ी चलाना जानते थे। बरसों तक प्रोडक्शन प्लांट में काम किया। मशीनें चलाते रहे। बुढ़ापा पास आया, रिटायर भी हो गए, प्लंबर का काम करने लगे। मेरी सोसाइटी में उन्हें पांच हजार रुपये मिलते हैं महीने के और उसमें बेहद खुश हैं। तमाम प्लंबर आए और भाग गए, लेकिन शुक्ला जी टिके हुए हैं। पहली बार मेरे वॉशरूम में समस्या आई तो फोन करने पर शुक्ला जी आए थे। काम देखा, काम किया। मेरे भीतर एक हिचक थी, सोच रहा था कि कोई बहुत बड़ी मजबूरी होगी जो ये ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर प्लंबर का काम कर रहे हैं, लोगों के यूज्ड कमोड तक इधर से उधर लगा रहे हैं। बातों-बातों में शुक्ला जी बोले-साहब यही छेनी हथौड़ी हमारी रोजी रोटी है। काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता, इंसान को अपनी औकात के हिसाब से काम तलाश करना चाहिए और जो मिले, उसमें खुश रहना चाहिए।
शुक्ला जी ने मुझसे मेरा घर, मेरी पत्नी का मायका पूछा। मेरी पत्नी चूंकि बलरामपुर से पढ़ी-लिखी हैं और बलरामपुर कभी गोंडा जिले में था। खैर, जब चलने लगे तो बोले-मैं आपके पांव छूना चाहता हूं। मैं हतप्रभ। बोले-नहीं मेरा हक है, क्योंकि हमारी बेटी आपके घर ब्याही है। कायदन तो मुझे आपके घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए।
शुक्ला जी कई बार फ्लैट में आए, जब भी कोई काम होता है, बड़े मनोयोग से करते हैं। पहले के प्लंबर तो सोसाइटी से तनख्वाह पाने के बावजूद कुछ न कुछ पैसे लेकर जाते थे, लेकिन शुक्ला जी किसी से पैसा नहीं मांगते। अभी मेरे वाशरूम में फ्लोर टूटकर नया लगा है, शुक्ला जी कमोड फिट कर गए, बाथरूम का दुख-दर्द हर गए। परसों ही बताया कि उन्होंने दोनों बेटों को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है। एक किसी सीए के यहां कंप्यूटर चलाता है, दूसरा डीजे बजाता है, जो शुक्ला जी को पसंद नहीं है। खैर, दोनों बेटों की शादी कर दी, साथ ही खुद से अलग भी कर दिया। बोले-अपनी गृहस्थी जमाओ, कुछ जरूरत पड़ी तो मैं हूं ही, कमाई ज्यादा होने लगे तो गांव वाले घर की मरम्मत करवाने में मदद करो।
अभी खबर आई है, वायरल भी हुई है कि उत्तर प्रदेश के कानपुर में सफाई कर्मचारी (स्वीपर) के 3 हजार 275 पदों के लिए हजारों सवर्णों ने अप्लीकेशन डाला है और 5 लाख लोग तो ऐसे हैं, जो ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट हैं। अगर ऐसा है तो बुरा क्या है। मैंने लाखों, करोड़ों की कमाई करने वालों को भयानक तौर पर अपनी नौकरी, अपने कामकाज से असंतुष्ट देखा है। शुक्ला जी की दास्तान मैंने जान बूझकर रखी है, पसीने से भीगे चेहरे पर अपना काम करने के वक्त जो खुशी उनके चेहरे पर रहती है, वो अनमोल है। उनसे सीख मिलती है कि कोई काम छोटा नहीं होता। आदमी छोटा या बड़ा होता है।