शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

अमिताभ का ख़त नातिन नव्या और पोती आराध्या के नाम

पिछले दिनों ऐश्वर्या राय की अगली फिल्म 'ऐ दिल है मुश्किल' के टीज़र लॉन्च के बाद कुछ इस तरह की खबरें मीडिया में छाई रहीं कि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में रणबीर कपूर के साथ अपनी बहू के हॉट सीन को देख नाराज हैं। हालांकि, यह बात कितनी सही है और कितनी गलत, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन अब अमिताभ ने अपने खानदान की बेटियों के लिए कुछ ऐसे शब्द लिखे हैं, जो उन्हें बेझिझक आगे बढ़ने और अपने दम पर जिंदगी जीने के लिए प्रेरणास्रोत साबित होंगे।
तुम दोनों के नाजुक कंधों पर बेहद अहम विरासत की जिम्मेदारी है। आराध्या, अपने परदादा जी डॉ. हरिवंश राय बच्चन और नव्या अपने परदादा जी श्री एच.पी. नंदा की विरासत संभाल रही हैं। तुम दोनों के परदादा जी ने तुम्हें मौजूदा सरनेम दिया है, ताकि तुमलोग इस प्रतिष्ठा, उपाधि और सम्मान को सेलिब्रेट कर सको। तुम दोनों भले ही नंदा या बच्चन हो, लेकिन तुमदोनों लड़की हो...महिला हो! और चूंकि तुमलोग महिला हो इसलिए लोग अपनी सोच, अपना दायरा तुम पर थोपने की कोशिश करेंगे। वे तुमसे कहेंगे कि तुम्हें कैसे कपड़े पहनने चाहिए, कैसा व्यवहार करना चाहिए, किससे मिलना है और कहां जाना है। लोगों की धारणाओं में दबकर न रहना। अपने विवेक के बल पर अपने फैसले खुद करना। किसी को यह तय करने का हक न देना कि तुम्हारी स्कर्ट की लंबाई तुम्हारे कैरक्टर का पैमाना है। किसी को यह सलाह देने की अनुमति मत देना कि कौन तुम्हारे दोस्त होने चाहिए और तुम्हें किन लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए। किसी और वजह से शादी करने की जरूरत नहीं जबतक कि तुम खुद शादी के लिए तैयार न हो। लोग बातें करेंगे। वे काफी बेकार बातें करेंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हें हर किसी की बातें सुननी है। कभी भी इन बातों से परेशान न होना कि लोग क्या कहेंगे। आखिरकार सिर्फ तुम दोनों ही ऐसी हो, जिन्हें अपने किसी भी काम का नतीजा झेलना पड़ेगा, इसलिए किसी दूसरे को तुम्हारे लिए फैसला लेने का हक मत देना। नव्या- तुम्हारा नाम, तुम्हारे सरनेम की खासियत तुम्हारी उन मुश्किलों से नहीं बचाएगी, जो महिला होने की वजह से तुम्हारे सामने आएंगी। आराध्या- समय के साथ तुम इन चीजों को समझोगी। हो सकता है कि तब मैं तुम्हारे आसपास न रहूं, लेकिन मुझे लगता है कि जो कुछ आज मैं कह रहा हूं उस वक्त भी तुम्हारे लिए प्रासंगिक (उचित) रहेगा। यह मुश्किल हो सकता है, एक महिला के लिए यह दुनिया मुश्किल हो सकती है, लेकिन मेरा यकीन है कि तु्म्हारी जैसी महिलाएं इन चीजों को बदल सकती हैं। अपनी सीमाएं खींच पाना, अपनी पसंद रखना, दूसरों को फैसले से ऊपर उठकर सोचना भले ही आसान न हो, लेकिन तुम!...तुम हर जगह महिलाओं के लिए एक उदाहरण बन सकती हो। ऐसा ही करना और जितना मैंने अबतक किया है तुमलोग उससे कहीं ज्यादा करोगी और मेरे लिए सम्मान की बात होगी कि मैं अमिताभ बच्चन के नाम से नहीं, बल्कि तुम्हारे दादा और नाना के रूप में जाना जाऊं।

प्यार और स्नेह के साथ
तुम्हारे दादा जी और नाना जी

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

मंत्री संदीप कुमार को गलत कहने से पहले 'रूस्तम' फिल्म देख आएं...


Anil Dwivedi 

आप नेता और महिला बाल विकास मंत्री संदीप कुमार की आई ताजा सेक्स-सीडी पर अजीब से तर्क उठे हैं. सोशल मीडिया पर कईयों को इसमें कुछ भी गलत नही दिख रहा. ऐसे लोग सबसे पहले 'रूस्तम' फिल्म देख आएं. हो सकता है उनकी अक्ल के बंद पडे ताले खुल जाएं. और जो फिल्म नही देख सकते, वे रामायण के उस उत्तरकाण्ड युदधकाण्ड को पढ लें जिनकी धमनियों में यह धार्मिक पुस्तक पीढी दर पीढी रचती-बसती आ रही है. रूस्तम फिलम में एक नौसेना का आॅफिसर अपनी पत्नी के धो खे से इस कदर व्यथित है कि वह अपनी पत्नी के साथ अंतरंग संबंध बनाने वाले ब्वॉयफ्रेण्ड की हत्या तक कर देता है. समाज जानता है कि रूस्तम ने हत्या की है मगर चूंकि उसकी नजर में ये संबंध अनैतिक और अपराध जैसा है, पति को धोखा देने की तरह है, इसलिए उसने रूस्तम के कदम को सही बताया. 
एक पत्नी या पति के होते हुए दूसरे से नाजायज संबंध रखना, सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं, उस अमरीका में भी अस्वीकार्य रहा है जहां यौन संबंधों की मुक्त वकालत होती है. याद कीजिये अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लेंविंसकी के बीच के अवैध संबंधों को- कोई सीडी या फोटो सामने नही आए थे. मोनिका ने एफआईआर तक नहीं की थी मगर नैतिकता के पायदान से गिरकर अमरीकी राष्ट्रपति जैसे पद की जो किरकिरी हुई, उसी से व्यथित होकर क्लिंटन ने सार्वजनिक तौर पर अपनी पत्नी और अमरीकी समाज से माफी मांगी थी. अब आइए रामायण के उत्तरकाण्ड पर. सिर्फ राजा की मर्यादा की रक्षा के लिए, लोकोपवाद से बचने के लिए राम ने सीता का परित्याग किया. पहली बार सीता ने अगिनपरीक्षा दी क्योंकि उनके चरित्र पर संदेह उनके पति राम ने जताया था. तब सीता ने यह कहते हुए अग्नि में प्रवेश किया कि अगर मेरा चरित्र शुदध हो तो अगिनदेव मेरी रक्षा करें और सीता माता परीक्षा में खरी होकर वापस लौटी थीं. दुबारा जब इसी समाज ने सीता के चरित्र पर उंगलियां उठाईं तो सीताजी ने कोई परीक्षा नही दी. उन्होंने सीधे धरती को पुकारा और उसमें समा गईं. सवाल है सीता माता वापस क्यों नही लौटी? वाल्मीकि यहां स्पष्ट करते हैं कि चूंकि पहली बार उनके पति ने शक जताया था अत: खुद को पवित्र साबित करना, पत्नी यानि सीता की जिम्मेदारी थी लेकिन जब दूसरी बार समाज ने चरित्रहीन होने की आशंका जताई तो सीता को बचाने की जिम्मेदारी उनके पति यानि भगवान राम की थी लेकिन राम चुप रहे. उनके सामने दो ही विकल्प थे. पहला वे सीता को साथ रखते और राजपाट छोड देते और दूसरा सीता को छोडकर राजपाट संभाले रहते. एक राजा की पहली जिम्मेदारी अपनी प्रजा यानि समाज की चिंता है इसलिए उन्होंने सीता को त्याज्य दिया. हो सकता है एक राजा के तौर पर भगवान राम को महज यह भय था कि अगर उन्होंने सीता का पक्ष लिया तो कहीे पूरी प्रजा ही दुराचारी ना हो जाए इसलिए भगवान राम ने सीता का परित्याग किया. इसीलिए कलियुग में हर राजनीतिक दल इसी परिपाटी को आगे बढा रहा है. भाजपा से संजय जोशी, राघव महाराज, कांग्रेस से अभिषेक मनु सिंघवी या मदेरणा जैसों को तुरंत निष्कासित किया गया क्योंकि ये सब राजा यानि मंत्री, प्रवक्ता इत्यादि पदों पर थे जो कि सार्वजनिक नैतिकता के धरातल पर हमेशा पाक साफ होने चाहिए और दिखने भी चाहिए.

कोई काम छोटा नहीं होता आदमी छोटा-बड़ा होता

 - Vikas Mishra


ये शुक्ला जी हैं। जिस सोसाइटी में रहता हूं, उसमें ये प्लंबर का काम करते हैं। दाढ़ी, मूंछ, बाल सब सफेद हो चुके हैं, लाइट कलर के कपड़े पहनते हैं, माथे पर चंदन लगाते हैं और बड़ी लगन से अपना काम करते हैं। उम्र 60 पार कर गई, लेकिन जब भी देखो, पूरी तरह प्रसन्न नजर आते हैं। हैं उस पूर्वी उत्तर प्रदेश से, जहां ब्राह्मण परिवारों के नौजवान- ये काम मेरा नहीं है.... अब मेरे ये दिन आ गए, जो मैं ये काम करूंगा..? जैसे फिजूल के सवालों में उलझे हैं, उनके लिए शुक्ला जी आदर्श की तरह खड़े हैं।

शुक्ला जी गोंडा के रहने वाले हैं, आईटीआई की पढ़ाई की थी। बड़े भाइयों से झगड़ा हुआ, भाग आए दिल्ली। पेचकस, प्लास, छेनी- हथौड़ी चलाना जानते थे। बरसों तक प्रोडक्शन प्लांट में काम किया। मशीनें चलाते रहे। बुढ़ापा पास आया, रिटायर भी हो गए, प्लंबर का काम करने लगे। मेरी सोसाइटी में उन्हें पांच हजार रुपये मिलते हैं महीने के और उसमें बेहद खुश हैं। तमाम प्लंबर आए और भाग गए, लेकिन शुक्ला जी टिके हुए हैं। पहली बार मेरे वॉशरूम में समस्या आई तो फोन करने पर शुक्ला जी आए थे। काम देखा, काम किया। मेरे भीतर एक हिचक थी, सोच रहा था कि कोई बहुत बड़ी मजबूरी होगी जो ये ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर प्लंबर का काम कर रहे हैं, लोगों के यूज्ड कमोड तक इधर से उधर लगा रहे हैं। बातों-बातों में शुक्ला जी बोले-साहब यही छेनी हथौड़ी हमारी रोजी रोटी है। काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता, इंसान को अपनी औकात के हिसाब से काम तलाश करना चाहिए और जो मिले, उसमें खुश रहना चाहिए।
शुक्ला जी ने मुझसे मेरा घर, मेरी पत्नी का मायका पूछा। मेरी पत्नी चूंकि बलरामपुर से पढ़ी-लिखी हैं और बलरामपुर कभी गोंडा जिले में था। खैर, जब चलने लगे तो बोले-मैं आपके पांव छूना चाहता हूं। मैं हतप्रभ। बोले-नहीं मेरा हक है, क्योंकि हमारी बेटी आपके घर ब्याही है। कायदन तो मुझे आपके घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए।
शुक्ला जी कई बार फ्लैट में आए, जब भी कोई काम होता है, बड़े मनोयोग से करते हैं। पहले के प्लंबर तो सोसाइटी से तनख्वाह पाने के बावजूद कुछ न कुछ पैसे लेकर जाते थे, लेकिन शुक्ला जी किसी से पैसा नहीं मांगते। अभी मेरे वाशरूम में फ्लोर टूटकर नया लगा है, शुक्ला जी कमोड फिट कर गए, बाथरूम का दुख-दर्द हर गए। परसों ही बताया कि उन्होंने दोनों बेटों को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है। एक किसी सीए के यहां कंप्यूटर चलाता है, दूसरा डीजे बजाता है, जो शुक्ला जी को पसंद नहीं है। खैर, दोनों बेटों की शादी कर दी, साथ ही खुद से अलग भी कर दिया। बोले-अपनी गृहस्थी जमाओ, कुछ जरूरत पड़ी तो मैं हूं ही, कमाई ज्यादा होने लगे तो गांव वाले घर की मरम्मत करवाने में मदद करो।
अभी खबर आई है, वायरल भी हुई है कि उत्तर प्रदेश के कानपुर में सफाई कर्मचारी (स्वीपर) के 3 हजार 275 पदों के लिए हजारों सवर्णों ने अप्लीकेशन डाला है और 5 लाख लोग तो ऐसे हैं, जो ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट हैं। अगर ऐसा है तो बुरा क्या है। मैंने लाखों, करोड़ों की कमाई करने वालों को भयानक तौर पर अपनी नौकरी, अपने कामकाज से असंतुष्ट देखा है। शुक्ला जी की दास्तान मैंने जान बूझकर रखी है, पसीने से भीगे चेहरे पर अपना काम करने के वक्त जो खुशी उनके चेहरे पर रहती है, वो अनमोल है। उनसे सीख मिलती है कि कोई काम छोटा नहीं होता। आदमी छोटा या बड़ा होता है।

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

वो शरीर से गया, ये आत्मा से

जिंदगी और मौत से जूझते योगेश साहू ने अंतत: दम तोड दिया. आज उसके अंतिम संस्कार में जो भीड उमडी, वह इस बात की गवाह है कि सरकारी मशीनरी में मानवीयता और संवेदनशीलता भले ही कोने में बैठी सिसक रही हो मगर सामाजिक संस्कारों में वह आज भी फल—फूल रही है. योगेश उन लाखों युवाओं में से एक था जिनके लिये सवेरा नई मेहनत और शाम थकान लेकर आती है. उसके लिए सरकार और विपक्ष से लेकर आम आदमी तक चिंतित है, लेकिन इतना भागयशाली रमजान अली नही था. जबकि वह ज्यादा भयावह अत्याचार से गुजरा था...!  
लगभग ढाई साल पहले तीन महीने से छिन चुकी अपने पसीने की कमाई को हासिल करने की गुहार लगाते-लगाते रमजान अली दुनिया से चल बसा. कांकेर के जिलाधीश कार्यालय में जब उसने मिट्टी का तेल छिडक़कर अगिनदाह किया तो उसकी आत्मा के साथ-साथ मानवता, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सुराज के खोखले दावे भी होम हो चुके थे. इस ह्दय विदारक घटना ने दो बड़े सवाल उभारे हैं. पहला यह कि जिंदगी और मौत से जूझते अली ने जिस अफसर को दोषी बताया है, उसके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं हुई? और दूसरा यह कि सरकार और प्रशासन यदि अफसर को बचाने में लगे रहे तो कर्मचारी-कल्याण के नाम पर नेतागिरी बघारने वाले या मुस्लिमहितों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले धार्मिक-सामाजिक संगठन या उसके नेता, रमजान को या उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिये आगे क्यों नहीं आए? 
भाईजान की मौत कई चेहरों पर एक बड़ा तमाचा है. वह जिला पंचायत कांकेर में ड्रायवर के पद पर कार्यरत था. मृत्यु-पूर्व दिये अपने बयान में अली ने तत्कालीन जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, आइएएस भीम सिंह को अपनी मौत के लिये जिम्मेवार ठहराया है. इसके अलावा मेरे पास उस आवेदन-पत्र की कॉपी भी है जो उसने कलेक्टर को लिखा था. दो नवम्बर के इस पत्र में रमजान ने कहा था, ‘जिला पंचायत के सीईओ ने सितम्बर व अक्टूबर माह का मेरा वेतन बिना कारण बताए रोक दिया है. मुझे कार्य में अनुपस्थिति रहने का कारण बताओ नोटिस दिया जाता है जबकि मैं नियमित रूप से अपने कर्तव्य स्थल पर उपस्थित रहता हूं और हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करता हूं जिसकी जांच करवा सकते हैं.’ वह आगे लिखता है : मेरी पत्नी ह्दय रोग से पीडि़त है. वेतन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी हो रही है. मुझे ऐसा लगता है कि मैं आत्महत्या कर लूं.’
लेकिन तर्कों और दिलासों के तीर चला रही पुलिस के लिये मानो ये दोनों सबूत सीईओ के खिलाफ एफआइआर के लिये पर्याप्त नहीं हैं इसलिए अभी भी जांच जारी है. तय है कि यह कवायद भी खानापूर्ति के साथ खत्म हो जायेगी. कई मामलों का हश्र हम देख चुके हैं. मुद्दे की बात यह है कि अली ने मदद पाने के लिये अफसरों के अलावा मंत्री सहित हर उस दरवाजे पर दस्तक दी जहां से उसे न्याय मिलने की उम्मीद लग रही थी लेकिन हाथ आई तो सिर्फ निराशा जिसके बाद उसने जीवनलीला समाप्त कर ली. कांकेर की तत्कालीन जिलाधीश अलरमेल मंगई डी की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है. चर्चित झालियामारी आश्रम काण्ड में उनकी निष्पक्ष और त्वरित कार्यवाही की खासी सराहना हुई थी लेकिन अली की शिकायत के निराकरण में जिस तरह की लेटलतीफी हुई या जानबूझकर होने दी गई, उससे मेडम की प्रतिष्ठा और ईमानदारीपूर्ण सेवा पर प्रश्न खड़ा हुआ है. 
इस मजबूरी को समझा जा सकता है कि एक आइएएस, दूसरे साथी आइएएस के खिलाफ कार्रवाई करे तो कैसे करे? आश्चर्य कि जिस सरकार ने लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर रखा है तथा जिसके अंतर्गत शासकीय सेवकों और नौकरशाहों को एक निश्चित अवधि के अंदर शिकायतों का निबटारा करना जरूरी होता है-वहां पर अली के आवेदन का निराकरण तीन महीने बीतने के बाद भी नहीं हो सका. एक बार मान भी लिया जाए कि रमजान ने ड्यूटी करने में लापरवाही बरती होगी लेकिन उसका वेतन रोकने का अधिकार आपको कैसे मिल गया? इसके पूर्व उसे कितने नोटिस दिये गये? निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई के दौरान भी कर्मचारी को आधा वेतन या पेंशन पाने का अधिकार होता है. इस मुकाबले रमजान का गुनाह तो हल्का ही है.सरकार या प्रशासन बता सकता है क्या कि ऐसे अक्षम्य  अपराध के दोषी अफसरों को क्या सजा मिली। आज दोनों आईएएस कलेक्टरी का मज़ा ले रहे हैं। पता नहीं कि एफ आई आर हुई भी कि नही। हुई भी होगो तो ठन्ड बस्ते में  ठहर गई होगी। गुलामी के दौर में कभी एक अंग्रेज ने सही कहा था कि तुम्हारी यानी जनता की किस्मत लिखने का काम गॉड ने हमें आईएएस बनाकर किया है।
लेकिन रमजान ने अनमोल कीमत चुकाई. वह शासकीय कर्मचारी और ड्रायवर संघ का अध्यक्ष भी था लेकिन उसके परिवार की मदद के लिये कोई सामने नहीं आया. कर्मचारी-हितों के नाम पर कितने ही गुट-संगठन नेतागिरी करते हैं लेकिन प्रशासनिक दबाव के आगे सब बेबस नजर आ रहे. धर्म के उसूलों को आधार बनाकर बात-बात पर फतवा जारी करने वाली जमात हो या उनके नेता या फिर वोटों की खातिर अपनी राजनैतिक जमीन सींचने वाले राजनीतिक दल, रमजान अली की मौत पर आँसू बहाने का समय किसी को नहीं मिला. उसके जिंदा रहते ना सही, उसकी दुर्भागयपूर्ण और शर्मनाक मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने की लड़ाई कांकेर से लेकर राजधानी तक लड़ी जानी चाहिए।
याद रखें कि यह घटना लाल आतंक में लिपटे उस जिले में हुई है, जहां आंख के बदले आंख का कबीलाई कानून लागू है लेकिन लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद कानून के सांचे में ढली होती है. फिलहाल कमाऊ पूत के अचानक गुजर जाने से व्यथित पिता और अली का परिवार कलेक्टर के झूठे दिलासों का कफन ओढक़र सोने को मजबूर है. हुसैनी सेना, अली सेना, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अलावा मुस्लिम पंचायत और सीरत कमेटी जैसे संगठन हैं जिनकी एक आवाज पर पूरी कौम मदद के लिए खड़ी हो सकती है. वे चाहें तो रमजान के परिवार कोन्याय दिलाने की लड़ाई लड़ सकते हैं. यदि पत्थरों से बने आस्था-स्थलों के नाम पर जेहाद छिड़ सकता है तो रमजान को न्याय दिलाने के लिये क्यों नहीं?
देखते हैं योगेश कितना भागयशाली निकलता है..!
- अनिल द्विवेदी
( लेखक पत्रकार हैं )

बुधवार, 22 जून 2016

70 साल की बुजुर्ग मां को बेटों ने सड़क पर छोड़ दिया बेसहारा...

नाम-लता बाई. उम्र-70 साल के करीब. परिवार में- दो बेटे, तीन बेटियां और दर्जन भर नाती-पोते. पता- कलेक्टोरेट चौक का बस स्टॉप (मंगलवार शाम से माना वृद्धाश्रम). भरा-पूरा परिवार, पर किसी के भी दिल और घर में इस बुजुर्ग के लिए जगह नहीं.
कुछ दिनों पूर्व मेरी दोस्त नचिकेता तिवारी की नजर उस बुजुर्ग पर पड़ी. आॅफिस आते-जाते वक्त वह रोज उसे उसी जगह पर गुमसुम, उदास और अकेली बैठी मिलतीं. उसने करीब सप्ताह भर देखा, पर उससे और अधिक देखा न गया. रविवार को उसने मुझे फोन किया और उनके बारे में बताया. उसने कहा, हमें उनके लिए कुछ करना चाहिए. मैने पूछा-क्या? उसने कहा, उन्हें किसी वृद्धाश्रम में भर्ती करा देते हैं. बरसात का मौसम है, कैसे रहेंगी वे उस शेड के नीचे. मैने कहा-चलो कल देखते हैं. सोमवार को मैं उन बुजुर्ग से मिलने पहुंचा. सोचा, पहले उनसे बात कर लूं. पता तो करूं कि वे वहां शेड के नीचे क्यों रह रहीं हैं. पर, उन्होंने अपनी जो कहानी बताई उससे मेरी आंखें भर आईं. उन्होंने तीन दिनों से कुछ खाया-पिया भी नहीं था. वे रोजाना अंबेडकर अस्पातल के पास से खाना लेकर आती थीं और दोनों वक्त खाती थीं, लेकिन चार दिन पहले उनके एक्सीडेंट हो गया. किसी आॅटो वाले ने टक्कर मार दी. पैर में चोट लगी तो चलना-फिरना बंद. लेकिन पेट की मजबूरी देखिए, वे दूसरे दिन भी खाना लाने निकली, लेकिन चलते हुए नहीं, घिसटते हुए. सड़क गर्म थी, हाथ जल गए. फफोले पड़ गए. तेज दर्द होने लगा. ऊपर से पैर की चोट. लेकिन ये सारे दर्द उस दर्द के आगे कमजोर थे, जो उन्हें अपनों ने दिया था. इसलिए वे इस दर्द को आंसुओं के साथ पी गईं, बिना किसी को कुछ बोले. मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होने मुझे अपने घर-परिवार के बारे में बताया. अपने बेटे और बेटियों के बारे में बताया. उन बहुओं और पोते-पोतियों के बारे में भी बताया जो उन्हें देखते ही घर का दरवाजा बंद कर लेते हैं. सब सुनकर मन टूट सा गया और दिल से यही निकला कि भगवान और किसी को ऐसे दिन मत दिखाना. मैने उनसे वृद्धाश्रम में रहने के लिए पूछा तो वे तैयार हो गईं. हालांकि अपने स्तर पर वे पहले प्रयास कर चुकीं थीं, लेकिन किसी ने उन्हें रखा नहीं था. मेरे साथ मेरा दोस्त शेखर झा भी था, जिसने उनके लिए खाने का इंतजाम किया. इसके बाद हमने वृद्धाश्रम में उनके रहने के इंतजाम को लेकर फोन लगाना शुरू किया. कई लोगों से बात हुई, पर बात नहीं बनी. प्रयास दूसरे दिन मंगलवार को भी प्रयास जारी रहा. सरकारी और प्राइवेट दोनों संस्थाओं से बात हुई, लेकिन कई तरह की अड़चनों के चलते बात नहीं बन पाई. आखिरकर समाजकल्याण विभाग के राजेश तिवारी जी से मेरी बात हुई. उन्होंने तत्परता के साथ मेरी मदद की. मुझे माना वृद्धाश्रम के शरद तिवारी जी का नंबर दिया. उनसे बात हुई. वे उन बुजुर्ग को रखने के लिए तैयार हो गए. थोड़े देर में उन्होंने मुझे समाज कल्याण विभाग के ठाकुर साहब का नंबर दिया. शाम चार बजे के करीब ठाकुर साहब उन्हें ले जाने के लिए आ गए. मैं भी पहुंच गया. मैने जब उन्हें बताया कि आपके रहने का इंतजाम माना वृद्धाश्रम में हो गया है तो वे बहुत खुश हुईं. उनकी आंखों में आंसू भर आए. उन्होंने मुझे ढेर सारा प्यार और आर्शिवाद दिया. साथ ही जाते-जाते बोलीं कि मिलने के लिए जरूर आना...
फिलहाल वे ठीक है. हाथ-पैर के चोट का इलाज हो रहा है. लेकिन जो चोट अपनों ने दिया है, वह शायद ही भर पाए.
मेरे इस छोटे से प्रयास में उन सभी का धन्यवाद जिन्होंने मेरा सहयोग किया. खासकर नचिकेता, शेखर झा, राजेश तिवारी जी, शरद तिवारी जी, ठाकुर साहब, बढ़ते कदम के राजू धम्मानी, पहलाज जी सभी का ह्रदय से 


यहाँ कर सकते हैं संपर्क 
आप सभी से निवेदन है कि शहर में कहीं भी वृद्धा या वृद्ध सड़क पर या कहीं और बेघर मिले तो आप हमें सूचना दे| उनकी हम मदद करेगे| शहर के वृद्धा आश्रम में बात कर उनके रहने की व्यवस्था की जाएगी| इस काम की शुरुआत प्रफुल्ल भईया ने कई साल पहले कर दिया था, लेकिन कचहरी चौक पर एक महिला की मदद कर के मन को शांति मिली| आप शेखर को 8982224445, प्रफुल्ल को 8827824668 पर कर सकते है|

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

दुनिया के कोने-कोने से किताबें खोजकर देना है शौक

हर आम और खास में किताबें पढऩे का शौक पैदा करना कपूर वासनिक को दिली सुकून देता है। यही वजह है कि उन्होंने लोगों को दुर्लभ और नई-पुरानी किताबें उपलब्ध करवाने का बीड़ा उठा रखा है। विश्व के किसी भी विषय, राइटर या एडिशन की किताबें वे हर हाल में लाकर देते हैं। फिर चाहे इसके लिए उन्हें देश-दुनिया में कहीं भी बात क्यों न करनी पड़े। पढऩे का रुझान कम होने को लेकर उनका कहना है कि दरअसल माता-पिता बच्चों को किताबें ही लाकर नहीं देते। अज्ञेय नगर में रहने वाले कवि कपूर वासनिक को चलती-फिलती लाइब्रेरी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। चाहने वाले उन्हें इसी नाम से जानते हैं। इस दौर जब लोगों का रुझान किताओं की ओर लगातार घट रहा है, इनकी जगह इंटरनेट ने ले ली है। ऐसे में वासनिक लोगों को किताबों के संसार में ले जा रहे हैं। अपने इस शौक के पीछे वे पैसे को अहमियत नहीं देते। मांग आई तो वासनिक किताबें अपनी जेब से खरीदकर देते हैं। पैसे वापस नहीं मांगते। कोई दे भी तो रेट वही, जिस पर कंपनी ने उन्हें दी हो। इस फेर में अब तक लाखों रुपए यूं ही खर्च हो चुके, लेकिन सुकून सिर्फ एक कि लोग पढऩे तो लगे हैं।

कई जगहों पर शुरू कराई नि:शुल्क लाइब्रेरी  
वासनिक छत्तीसगढ़ मराठी साहित्य परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष हैं। शहर में उन्होंने किराए का मकान लेकर लाइब्रेरी खोली है। यहां भी पैसे नहीं लिए जाते। फिलहाल यहां मराठी साहित्य की किताबें हैं। जल्द ही हिंदी किताबें भी रखी जाएंगी। उनकी पहल से ही भिलाई व कोरबा में भी लाइब्रेरी खुली। वहां भी वासनिक ही किताबें भेजते हैं।

यूनिवर्सिटी में पढ़ी जाती हैं इनकी कविताएं 
वासनिक अच्छे कवि भी हैं। मराठी में उनके दो काव्य संग्रह हैं। उनकी कविताएं मुंबई, औरंगाबाद, नागपुर यूनिवर्सिटी की अंग्रेजी व मराठी के कोर्स में शामिल हैं।

पहले किताब छूते न थे, अब मांगते हैं 
सीपीएम के सचिव नंद कश्यप का कहना है कि वासनिक उन्हें चाही गई हर किताब दिला देते हैं। उनका रुझान किताबें पढऩे की ओर बढ़ा है। इसी तरह इंजीनियर संजय शर्मा का मानना है कि वासनिक चलती-फिरती लाइब्रेरी हैं।

जॉब में थे तो किताबें ही मित्र रहीं 
बैंक ऑफ महाराष्ट्र में कैशियर के पद पर रहते हुए उन्होंने किताबों को अपना दोस्त बनाए रखा। वे आज भी बच्चों को किताबों से कहानी-किस्से सुनाते हैं। युवाओं, बुजुर्गों, महिलाओं को किताबें उपलब्ध कराते हैं। साहित्य से जुड़े लोगों को जब कोई किताब नहीं मिलती तो वे वासनिक के पास आते हैं।

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

तुम्हारी मौत की खबर सुन दिल रो रहा




वीनू हम बहुत दुखी है तुम्हारी मौत की खबर सुनकर। दिल रो रहा है। कोई कहता है गलत इंजेक्शन लगने से तुम्हारी मौत हो गई तो कोई कहता है सड़क दुर्घटना में। जिस स्थिति में तुम्हारी मौत हुई। यह जानकर हम सब दुखी है। अब तुम हमारी यादों में ही रहोगी। अब भगवान से यही प्रार्थन करूंगा कि तुम्हारी आत्मा को शांति मिले और तुम फिर से किस मां के खोख से पैदा होकर अपने अधूरे सपने को पूरा करना। अपने परिवार का नाम रोशन करना।
हां हम बात कर रहे हैं जयपुर की मशहूर लेड़ी बाइकर वीनू पालीवाल की। वे देश का भ्रमण करने के लिए निकली थी। लेकिन सोमवार की शाम करीब छह बजे भोपाल के विदिशा में सड़क दुर्घटना में घायल हो गई। उस समय साथ में दोस्त शांतनु था। वे वीनू को ग्यारसपुर के शासकीय अस्पताल भर्ती कराया गया। जहां उसको नर्स ने इंजेक्शन दिया। इसके बाद विदिशा के लिए रवाना हो गए। रास्ते में उसकी हालत और बिगड़ती गई। विदिशा के शासकीय अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने तत्काल इलाज शुरू किया, जहां उनको मृत घोषित कर दिया। वीनू जब अंतिम सांसे गिन रही थी तो उसके साथ दोस्त शांतनु था। शांतनु के आंखें नम थी और वह सभी को बता रहा था कि सड़क दुर्घटना में वीनू के सिर्फ दाहिने हाथ की कोहनी और पैर में चोट लगी थी। इसके अलावा कहीं चोट नहीं था। उसकी मौत गलत इंजेक्शन लगने से हुआ है। दूसरी ओर पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि वीनू की मौत लीवर के बर्स्ट होने से हुआ है। जो भी हुआ और जैसे भी हुआ वीनू हमसे दूर चली गई। विश्वास नहीं हो रहा है, लेकिन यह सच है। जाते-जाते बस यह कहूंगा कि भगवान उसकी आत्मा को शांति दे और भगवान उसको फिर बेटी के रूप में ही धरती पर भेजना, ताकि वह अपने अधूरे सपने को साकार कर सके।