शनिवार, 14 जुलाई 2018

जब लड़कियों को घर से निकलना था मना, तब स्वीमिंग कॉस्टूयम में की प्रैक्टिस : परम पॉल


मैं सातवीं में थी, तब से स्वीमिंग की ट्रेनिंग के लिए जाती थी. उस समय लड़कियों का घर से निकलना मना था. इसके बाद भी मैं स्वीमिंग कॉस्टूयम में प्रैक्टिस करती थी. पापा का पूरा सपोर्ट था, जिसके कारण ही मैंने यह मुकाम समय रहते हासिल कर लिया. यह कहना है सीनियर स्वीमिंग कोच परम पॉल का. वह बेंगलुरु सहित कई राज्यों में सेवा देने के बाद वह इंडियन स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री में काम कर रही हैं. नौकरी करते हुए 34 साल पूरे हो चुके हैं. फिलहाल वह दिल्ली से रायपुर आई हैं. वह स्वीमिंग की ट्रेनिंग ले रहे पुरई गांव के बच्चों की रिपोर्ट तैयार कर खेल मंत्रालय को सौंपेंगी. उन्होंने खेल को लेकर देश में बदलते माहौल को लेकर खुलकर बात की. उन्होंने कहा कि स्वीमिंग पहले से बहुत बदल चुका है. पहले स्वीमिंग की प्रैक्टिस के लिए गिने-चुने बच्चे आते थे, आज बड़ी संख्या में आ रहे हैं. यही नहीं कड़ी मेहनत कर देश को मैडल भी दिला रहे हैं. उन्होंने बताया कि वे इंटर यूनिवर्सिटी लेवल के मैच में कई मैडल अपने नाम कर चुकी हैं. उन्होंने रायपुर को लेकर कहा कि मैं बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन जो बच्चे प्रैक्टिस कर रहे हैं, उनको देखकर यह जरूर कर सकती हूं कि बच्चे बहुत मेहनती हैं और जुनूनी हैं.
परम पॉल
मम्मी कहती थी- स्वीमिंग करो, डूबना नहीं 
परम पॉल ने बताया कि घर वालों का पूरा सपोर्ट था. मम्मी ने कभी स्वीमिंग करने को लेकर मना नहीं किया. पापा का पहले दिन से पूरा सपोर्ट मिला. पापा ने मेरी प्रैक्टिस देखकर कुछ दिनों के बाद खुद ही स्वीमिंग ज्वाइन कर ली. मम्मी का कहना था कि स्वीमिंग करोए लेकिन डूबना मत.

क्रिकेट की तरह स्वीमिंग को मिले बढ़ावा 
उन्होंने कहा कि स्वीमिंग के मैच गांव स्तर पर शुरू होने चाहिए. इससे ब्लॉक, जिला, राज्य और फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में आसानी होगी. अच्छे खिलाड़ी निकलेंगे. अभी के बच्चे भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. क्रिकेट की तरह भी स्वीमिंग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

नोट : यह खबर नारदपोस्ट डॉट न्यूज(Naradpost.news) में प्रकाशित हो चुका है. 


रविवार, 1 जुलाई 2018

बुआ को देख शुरू किया खेलना, दो साल में किया इंडिया कैंप तक का सफर


बुआ हर दिन सुबह-शाम प्रैक्टिस करने जाती थी. उनको देखकर मेरे मन मैं भी आया कि क्यों ना मैं भी बुआ के साथ खेलने जाऊं. दो साल पहले फुटबॉल खेलना शुरू किया. उस वक्त कोई सपना नहीं था. धीरे.धीरे खेल सुधरता गया. एक समय आया कि हर कोई मेरा खेल देख प्रभावित होने लगा. फिर मैंने भी कड़ी मेहनत की. इस बार जरूर दिमाग में था कि कुछ करना है. इसी कड़ी मेहनत का नतीजा है कि मेरा सलेक्शन इंडिया कैंप में ट्रेनिंग के लिए हुआ. यह अनुभव साझा कर रही हैं रायपुर की फुटबॉलर प्रियंका फूटान. प्रियंका कोलकाता में 8 नवंबर से 8 दिसंबर तक अंडर-15 इंडिया कैंप से ट्रेनिंग लेकर लौटी हैं. प्रियंका ने फुटबॉल से जुड़े हर मुद्दे पर खुलकर बात की. उन्होंने कहा कि इंडिया कैंप में एक महीने में जिस स्तर की ट्रेनिंग देते हैं, वैसा शायद ही छत्तीसगढ़ में मिल पाए. छत्तीसगढ़ में ट्रेनिंग की अच्छी व्यवस्था है, लेकिन हार्ड प्रैक्टिस नहीं होती. पहले सुबह उठकर कोचिंग जाती थीए फिर स्कूल से लौटकर कुछ खाकर सीधा ग्राउंड जाती थी. शुरू.शुरू में काफी दिक्कत हुई, लेकिन अब प्रैक्टिस में सब आ गया है. 

इस तरह हुआ सलेक्शन
पिछले दिनों मिजोरम में छत्तीसगढ़ की महिला फुटबॉल टीम खेलने गई थी. टीम में प्रियंका का भी सलेक्शन हुआ था. मैच के दौरान प्रियंका का शानदार परफॉर्मेंस रहा. सलेक्टर्स ने प्रियंका का खेल देखकर इंडिया कैंप के लिए सलेक्ट कर लिया. प्रियंका अब तक छह से अधिक स्कूल नेशनल और ओपन नेशनल खेल चुकी है.

कैंप में मिले नए दोस्त
प्रिंयका के अनुसार इंडिया कैंप के लिए जब मेरा सलेक्शन हुआ तो मैं बहुत खुश थी. घर वाले भी खुश थेए लेकिन मन में डर था क्योंकि कैंप में पहचान का कोई नहीं था. कैंप में जाने के बाद सीखने को तो मिला हीए साथ ही नए दोस्त भी बने.

इंडियन टीम को रिप्रजेंट करने का सपना
प्रियंका का कहना है कि हर खिलाड़ी का सपना होता है वह इंडिया टीम को रिप्रजेंट करे. मेरा भी सपना है कि मैं इंडियन फुटबॉल टीम की ओर से खेलूं. उसको रिप्रजेंट करूं. इस बार इंडिया टीम के लिए सलेक्शन नहीं हो पाया है. अगली बार फिर से कोशिश करुंगी कि मेरा सलेक्शन इंडियन टीम में हो और मैं देश के लिए खेलूं.

सपने को साकार करने में इनका रहा योगदान
प्रियंका के अनुसार बुआ को खेलता देख मैंने भी प्रैक्टिस की. इसके बाद कोच सरिता कुजूर और कोच मुश्ताक अली प्रधान ने खेलने के लिए तैयार किया. इन सब के अलावा पापा तरुण फूटान का योगदान है. वे हर समय मेरे साथ खड़े रहते हैं.


मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

एशिया चैंपियनशिप में छत्तीसगढ़ के इस खिलाड़ी ने बनाई जगह, कल हांगकांग के खिलाड़ी से है मैच


छत्तीसगढ़ के वेंकट गौरव प्रसाद और जूही देवांगन की जोड़ी का कमाल बुधवार को चीन में देखने को मिलेगा. चीन में बैडमिंटन एशिया चैम्पियनशिप की शुरुआत मंगलवार से हो चुकी है, जो 29 अप्रैल तक चलेगा. इसमें मिक्स्ड डबल्स कैटेगिरी में वेंकट और जूही का मैच बुधवार को होगा. शाम 4 बजे से शुरू होने वाले मैच में उनका मुकाबला हांगकांग के ली चूं लेई रेगिनॉल्ड और चाऊ होई वॉ के साथ होगा. चैम्पियनशिप में वेंकट और जूही की जोड़ी को मैन ड्रॉ से मिक्स्ड डबल्स कैटेगिरी में एंट्री मिली है. 

मालूम हो कि पिछले दिनों भारतीय बैडमिंटन संघ की ओर से रैंकिंग लिस्ट जारी गई थी. इसमें अंबिकापुर के वेंकट गौरव प्रसाद 1218 अंक के साथ पहले स्थान पर थे. भिलाई की जूही देवांगन ने 978 अंक के साथ 8वां स्थान हासिल किया था. वेंकट वर्ल्ड लेवल पर 117 और वर्ल्ड टूर लेवल पर 64 रैंकिंग पर हैं.

क्रिकेट के शौकीन थे वेंकट
वेंकट ने नारद पोस्ट से अपने शुरुआती दौर से लेकर अभी तक के सफर के लम्हों को शेयर किया. उन्होंने कहा कि वे 1996 से 2006 तक क्रिकेट के शौकीन थे. बैडमिंटन में भी हाथ आजमाते थे. 12वीं के एग्जाम से एक महीने पहले क्रिकेट और बैडमिंटन के नेशनल गेम की तारीख भी आ गई. पढ़ाई और गेम दोनों का दिमाग में टेंशन चल रहा था. इस बीच घर वालों का सपोर्ट मिला और उन्होंने क्रिकेट और बैडमिंटन का नेशनल गेम खेला. साथ ही, 12वीं की परीक्षा भी दिलाई. खुद की तैयारी को देखते हुए पास होने का कम ही चांस था, लेकिन 73 परसेंटेज से पास हुए. उन्होंने कहाए पैरेंट्स को बच्चों पर दवाब नहीं बनाना चाहिए. बच्चों को हमेशा अपने मन का करने देना चाहिए. इससे बच्चे अपने मुकाम हो हासिल करने में कामयाब होंगे.

क्रिकेट छोड़ने का नहीं है दुख
वेंकट ने कहा कि जब वे क्रिकेट खेलतेथेए तब छत्तीसगढ़ में ज्यादा स्कोप नहीं दिखा. वर्तमान में बीसीसीआई से मान्यता मिल गई है. उनके साथ खेलने वाले कई खिलाड़ी छत्तीसगढ़ टीम से खेल रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें क्रिकेट छोड़ने का कोई दुख नहीं है.

इन्होंने दिखाया था रास्ता
वेंकट ने बताया कि अगर उनकी मुलाकात छत्तीसगढ़ बैडमिंटन संघ के सचिव और कोच संजय मिश्रा से नहीं होती तो शायद वे क्रिकेट खेलते रहते. 2006 में भिलाई में कोच संजय मिश्रा से पहली बार मुलाकात हुई. उस दौरान उन्होंने कहा था कि सोच लो आगे क्या खेलना है. इसके बाद से ही उन्होंने बैडमिंटन को प्राथमिकता दी.

वेंकट के नाम हैं ये रिकॉर्ड्स
वेंकट के नाम कई रिकॉर्ड हैं. वर्तमान में मिक्स्ड डबल्स कैटेगरी में इंडिया नम्बर.1 हैं. वर्ल्ड लेवल पर 117 और वर्ल्ड टूर लेवल पर 64 रैंकिंग है.

नोट - नारद पोस्ट में खबर प्रकाशित हो चुकी है.

रविवार, 11 मार्च 2018

समर कैंप से शुरू हुआ सफर, अब है इंटरनेशनल शटलर, सिद्धार्थ से ही जानिए उनकी कहानी


छोटा थातो फुटबॉल खेलता था. कपड़े बहुत गंदे होते थे. एक बार दोनों हाथ भी टूट गए. मम्मी ने फुटबॉल खेल पर रोक लगा दी और इंडोर गेम खेलने कहा. इस बीच अखबार में सप्रे शाला में समर कैंप की खबर छपी. मम्मी ने एडमिशन करा दिया. इसके बाद क्या थामैंने भी फुटबॉल ने नाता तोड़ा और बैटमिंटन से जोड़ लिया. यह आप-बीती है स्वीडिश इंटरनेशनल बैडमिंटन टूर्नामेंट और आइसलैंड ओपन इंटरनेशनल बैडमिंटन कॉम्पीटिशन के विनर सिद्धार्थ प्रताप सिंह की. पिछले ही दिनों रायपुर पहुंचे सिद्धार्थ ने खेल के सफर को लेकर जो कुछ कहासुनिए उनकी ही जुबानी… 

जब मैंने बैडमिंटन खेलना शुरू कियातब 5वीं में पढ़ता था. फुटबॉल खेलने के दौरान हाथ टूट गए थेलेकिन उसके बाद भी मैंने बैडमिंटन के अच्छे शॉट्स खेले. कोच कविता दीक्षित ने मम्मी पूनम सिंह से कह दिया कि बैडमिंटन अच्छा खेल रहा है. इसको यही गेम खेलने दीजिए. इसके बाद पूरे परिवार का सपोर्ट मिलने लगा. मैं तीन महीने में डिस्ट्रिक्ट खेलकर चैम्पियन बन गया. शुरुआती दिनों में सिर्फ एन्जॉय के लिए बैडमिंटन खेला करता थालेकिन जैसे-जैसे गेम जीतने लगारैंक मिलती गईतो मेरे अंदर खेलने की भावना बढ़ते चली गई.

टॉप-10 में आने में लगे चार साल
मैं कड़ी मेहनत कर तीन महीने में डिस्ट्रिक्ट चैम्पियन बन गयालेकिन ऑल ओवर इंडिया टॉप-10 में जगह पाने में चार साल लग गए. इस बीच कई बार विनर बना और रनरअप भीलेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी. जब भी जीत नहीं पाता थातो मम्मी हिम्मत देती थी और कहती थी कि आगे बेहतर खेलना.

रायपुर फैसिलिटी के मामले में बहुत पीछे
छत्तीसगढ़ से बहुत अच्छे प्लेयर निकले हैं. छत्तीसगढ़ में खिलाड़ियों के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं है. दिल्लीगुजराजमहाराष्ट्र की बात करेंतो वहां एक साथ आठ से दस कोर्ट हैंलेकिन रायपुर में यह सुविधा नहीं है. यहां पर भी खिलाड़ियों के लिए कोर्टजिमदौड़ने के लिए ग्राउंड के अलावा अन्य सुविधाएं होनी चाहिए. उसके बाद ही अपना स्टेट आगे बढ़ पाएगा.

रायपुर आकर हो गया था लिमिटेड
मेरे कैरियर को देखते हुए फैमिली मेम्बर और कोच ने गोपीचंद एकेडमी में ट्रेनिंग लेने के लिए भेज दिया. वहां ट्रेनिंग के दौरान मैंने खेल को और बेहतर किया. इस बीच रायपुर में सा ट्रेनिंग सेंटर खुलने वाला थातो मैं रायपुर आ गया. रायपुर में बेहतर सुविधा नहीं होने से मैं खुद को लिमिटेड महसूस करने लगा. इसके बाद दोबारा प्रकाश पादुकोण का कोचिंग सेंटर ज्वाइन करने की कोशिश की. तीन दिन ट्रायल के बाद चयन हो गया. फिलहाल वहीं ट्रेनिंग ले रहा हूं. वहां ऑल इंडिया के सीनियर खिलाड़ी ट्रेनिंग लेते हैं. उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

अपने भाई से बहुत कुछ सीखा
मैंने अपने भाई जयदित्य प्रताप सिंह से बहुत कुछ सीखा है. कभी कोई शॉट खेलने में कंफ्यूजन रहता हैतो भाई से पूछता हूं. उसके खेलने का तरीका शानदार है. कई शॉट्स अच्छा खेलता है. मैं उससे हर दिन सीखने की कोशिश करता रहता हूं.

पापा का सपना कर रहा हूं साकार
जब भी जीत हासिल करता हूंतो अच्छा लगता है क्योंकि पापा का सपना था कि मैं स्ट्रीक वाले गेम खेलूं. मैं और मेरा भाई दोनों बैडमिंटन में अच्छे से अच्छा परफॉर्म करने की कोशिश करते हैं.



सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

दो दिनों से इंटरनेट पर छाईं प्रिया प्रकाश के नाम इंडिया न्यूज के युवा पत्रकार आकाश वत्स का खुला खत

प्रिया प्रकाश वारियर के नाम बधाई खत, प्रिय, प्रिया प्रकाश. सबसे पहले आपको ढेरों शुभकामनाएं और बधाई, चुकि इंटरनेट पर वायरल होने वाला ही आज कल असल में नायक है और हकीकत यही है कि आप आज इंटरनेट की असली नायिका हैं. दक्षिण की आप एकलौती अभिनेत्री हैं जिसने 72 घंटे में ही समूचे उत्तर भारत के युवा दिलों की घंटी को एक साथ बजा दिया है. आपको पुन: बधाई. पहली बार में 26 सेकेंड का मस्त-ए-निगाह वाला वायरल वीडियो देखकर मैं भी घायल सा हुआ पर स्कूल से विदा लिए 14 साल हो गए हैं तो कुछ देर में संभल गया.

माहौल भी भला वैलेंटाइन वीक का है, ऐसे में ये नाज़-अंदाज़-नख़रे-रूमानियत-अदा-ख़ामोशी-आंख-भौंह की बात ज्यादा चल रही है, इसी बीच वीडियो सामने आया तो समझिए कि दिलों में आग ही लग गई. आपकी आतिश कदह निगाहें इस वैलेंटाइन में नाउम्मीद हुए आशिक के लिए अमृत का काम कर गई. वैसे, अभिनय इसी का नाम है जो लोगों को उसकी हकीकत से परिचय करा दे. आप इसमें सफल हो गई हैं. आपको फिर से बधाई.
देखते ही देखते पूरा भारत आपका नाम जान गया, लेकिन मुझे उस लड़के का नाम नहीं मालूम चल रहा जो आपकी आंखों की अदा को देखकर दोस्त के कंधे पर ही अपनी जान को टिका देता है. धीरे-धीरे हर एक बात मालूम चली कि ये किसी मलयालम फिल्म का गीत का हिस्सा है. फिर आपकी उम्र, आपकी शिक्षा, आपकी पसंद कमोबेस आपकी हर एक बात से हर कोई वाकिफ हो चुका है.
आंखों की इस शालिन भाषा में हर कोई स्कूल के दौर में बात किया ही होगा, मेरी आंखों में तेरी दुनिया और तेरी आंखों में मेरी दुनिया. बाकी सब इस मासूमियत पर कुर्बान हो जाओ. 14 फरवरी आने में जब कुछ घंटे बाकी हैं, ऐसे में मुझे फिर से मेरे स्कूल की चौखट पर ला पटकने के लिए आपको तहे दिल से शुक्रिया.
ये वीडियो मेरे जैसों के लिए भी बाग़ों में बहार है, जो इस इश्क़ को समझकर भी स्कूल वाली हरकतें नहीं कर सकता. आपको पुन: बधाई. आपकी पहली फिल्म पर्दे पर आने से पहले आप सुपरस्टार बन गईं हैं. आंखों वाली अल्हड़ अदा के लिए देश आपका शुक्रगुजार रहेगा.
लेखक - आकाश वत्स


रविवार, 5 नवंबर 2017

चार महीने में ही बदला-बदला सा लगने लगा अपना पटना

छठ पूजा में अपने गांव राघोपुर(बिहार के मधुबनी जिले से 8 किलोमीटर दूर) जाना हुआ। पटना से होकर ही गांव जाते हैं। हालांकि हर बार की तरह इस बार भी  गांव में ज्यादा दिन तो नहीं रहा, लेकिन 48 घंटे पटना में गुजारे। इस दौरान बहुत कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। सरकार तो पिछली बार आने पर ही बदल गई थी। जो भी है, जैसा भी है, लेकिन पहले से पटना बदला-बदला सा लग रहा था।
      मैं 21 अक्टूबर को साउथ बिहार एक्सप्रेस ट्रेन से राजेन्द्र नगर टर्मिनल पर उतरा। स्टेशन से बाहर निकलकर पटना स्टेशन जाने के सड़क क्रॉस कर ऑटो पकड़ा। जाम होने के कारण फ्लाई ओवर के नीचे करीब आधा घंटा ऑटो में बैठा रहा। इस दौरान बैठे-बैठे  सब चीजों को निहार रहा था। लग रहा था कि बिहार में अब विकास हो रहा है। वैसे तो मैंने 30 नवम्बर 2016 को रायपुर को अलविदा कह दिया था। पटना में दैनिक जागरण संस्थान में नौकरी की शुरुआत की, लेकिन ज्यादा दिन नहीं रह पाया। यह भी कह सकते हैं कि मन नहीं लगा या फिर यह भी कह सकते हैं कि रायपुर वाले बड़े भाई, छोटे भाई, दोस्त सहित हमसे जुड़े लोगों के प्यार ने 9 महीने में ही वापस खींच लाया। यह इसलिए बता रहा हूं क्योंकि रायपुर आने के 4 महीने में बाद पहली बार घर जाना हो रहा था। पटना स्टेशन के सामने लम्बे समय से आर ब्लॉक से राजेन्द्र नगर जाने वाले फ्लाइ ओवर का भी काम लगभग पूरा-पूरा सा हो चुका है। पटना में रहने के दौरान काम के चलते स्टेशन जाना हुआ करता था। पर सही बताएं तो कभी भी खुश मन से नहीं जाता था, क्योंकि पटना स्टेशन या राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्टेशन जाने के लिए भीड़ का सामना करना पड़ता था, वह भी दो-चार मिनट का नहीं, बल्कि आधे घंटे या उससे अधिक। वहां लगने वाले जाम में मैं भी अक्सर फंस जाता था। उस फ्लाइ ओवर के दोनों साइड से काम पूरा हो चुका है। स्टेशन के सामने वाले हिस्से का काम बचा है, जो दिन-रात तेजी से चल रहा है। सही कहूं तो फ्लाइ ओवर बनने से जाम की स्थिति पूरी तरह खत्म हो जाएगा। गांव की यादें, ट्रेन का सफर सहित अन्य यादगार लम्हों को जनता दरबार पर आप से शेयर करुंगा। यह पहली कड़ी थी। 

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

पहली बार कुछ क्रिएटिव किया हूं…

मैंने न तो किसी विश्वविद्यालय से वीडियो एडिटिंग का कोर्स किया है और न ही ट्रेनिंग… एक दिन मन में आया कि क्यों न एक वीडियो एडिट किया जाए। वाट्सअप पर आने वाले वीडियो को देखकर बार-बार मेरा मन भी करता था। इस बीच एक दिन मैंने गुगल बाबा को प्रणाम किया और उसके बाद फ्री वाला वीडियो एडिटिंग का सॉफ्टवेयर तलाशने लगा, जो काफी मशक्कत करने के बाद मिल गया। इसके बाद क्या… नेक काम में देरी थोड़े न कोई करता है। सॉफ्टवेयर  को डाउनलोड किया। फिर सोचा कि किस टॉपिक पर पहला वाडियो तैयार किया जाए… ऑफिस के कुछ साथियों से भी पूछा, उनका जवाब था कि दिवाली पर ही कुछ देख लो, क्योंकि दिवाली के बस कुछ दिन ही तो बचे हैं। मैंने भी सोचा कि जैसा भी वीडियो बने, लेकिन दिवाली पर बधाई देने वाला ही वीडियो तैयार करूंगा। वीडियो बनाने के दौरान ऑफिस के साथी अंकुश भाई से कुछ मदद भी लेनी पड़ी और आधे घंटे के बाद एक वीडियो तैयार हो गया, जो कुछ ऐसा है…  क्लिक करें और वीडियो देख सकते हैं… और हां... मुझे सुझाव देना न भुलिएगा… 


शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

रोना आता है जब त्योहार में घर से दूर रहता हूं

त्योहार पर घर से दूर रहना कितना उदास कर देता हैयह वही समझ सकते हैंजो रोजी-रोटी की जद्दोजहद के चलते चाहकर भी ऐसे समय में परिवार के पास नहीं पहुंच पाते। मैं भी घर और परिजनों से दूर हूं। मेरे जैसे कई हजारों लोग भी त्योहार पर अपने घर नहीं जाते होंगे। ज्यादा से ज्यादा यह कि त्योहार के दिन घरवालों से फोन पर बात कर ली। हालांकि अब टेली कॉलिंग की सुविधा भी है। अपनी बात करुंतो त्योहार के मौके पर घर पर ना जा पानामुझे रुला देता है। कुछ देर को जी चाहता है कि सब छोड़-छाड़कर घर भाग जाऊं। परिवार के साथ खुशियां मनाऊंलेकिन यह मुमकिन नहीं। मैं पिछले 11 साल से घर से दूर हूं। कॉलेज के समय त्योहार से पहले लंबी छुट्‌टी पर घर चला जाता था। नौकरी शुरू होने पर क्या त्योहार और क्या आम दिनसब एक जैसे हो गए। कई बार तो पता तक नहीं चलता कि आज कोई त्योहार है। पढ़ाई के दौरान दुर्गा पूजा में घर जाता थातो दीपावली और छठ मनाकर ही लौटता था। अब ले-देकर ऑफिस से कुछ दिनों की छुट्‌टी मिलती है। इसमें भी आने-जाने का दिन शामिल होता है। मैं बिहार के मधुबनी जिले का रहने वाला हूं।रायपुर से बिहार के लिए ज्यादा ट्रेनें भी नहीं हैं। कुछ साल पहले तक तो सिर्फ एक ट्रेन हुआ करती थी साउथ बिहार एक्सप्रेस। रायपुर से सुबह 8 बजे सवार होंतो अगले दिन सुबह 9 बजे राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्टेशन पहुंचाती है। फिर बस से मधुबनी तक के सफर में करीब 4-5 घंटे लगते हैं। मधुबनी बस स्टैंड पर अगर फौरन गाड़ी मिल जाएतो समझिए आप किस्मत के धनी हैं। नहीं तो फिर किसी सवारी गाड़ी का इंतजार करें या फिर ऑटो वाली की लूट का शिकार बनें। पिछले कई सालों की तरह इस साल भी मुझे दीपावली घर से दूर ही मनानी होगी। यह और बात है कि लंबे अरसे बाद मुझे परिवार के साथ छठ पूजा मनाने का मौका मिलने वाला है। छठ पूजा का आंखों देखा हाल जनता दरबार पर आपसे जरूर शेयर करूंगा। तो फिर लगे रहिएमजे लेते रहिए और सुझाव भी देते रहिए।

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

तैयार रहो भाई…एक और बाबा की होगी धमाकेदार एंट्री

बाबायह शब्द सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं। दिमाग में फौरन खबरें चलने लगती हैंठगीधोखाधड़ीमहिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ आदि-आदि। यहां तक कि आप बिना जाने-समझे पुरानी कुंडली को खंगालते हैं और नए सिरे से कुंडली तैयार करते हैं। यह भी आसारामराम रहीम जैसा कैरेक्टर लैस होगा। मैं बाबाओं का सपोर्ट एकदम नहीं करता हूंलेकिन कुछ बाबाओं के चलते सभी को गलत बताना भी सही नहीं है। जिस प्रकार हाथ की सभी उंगलियां एक बराबर नहीं होती हैंउसी प्रकार सभी बाबा एक तरह के नहीं होते हैं। राम रहीम को सजा होने के बाद देशभर में फैले बाबाओं पर चर्चा गर्म है। आसारामसुखबिंदर कौर उर्फ राधे मांसच्चिदानंद गिरि उर्फ सचिन दत्ताओम बाबा उर्फ विवेकानंद झानिर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंहइच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदीस्वामी असीमानंदऊँ नमः शिवाय बाबानारायण साईंरामपालआचार्य कुशमुनिबृहस्तपति गिरि और मलखान सिंह खासे मशहूर हैं।
            मैं जिस बाबा की बात कर रहा हूंउसके बारे में खुद बाबा तक नहीं जानते हैं। मैं भी नहीं जानता थालेकिन करीब-करीब जानने लगा हूं। नए बाबा की धमाकेदार एंट्री होने वाली है। इसको लेकर तैयारी जोरों से चल रही है। अब आप भी सोच रहे होंगे कि यह बाबाकौन हैनाम क्या है। यह बाबा हैं… कुडकुडे बाबा। बाबा और उनकी खासियत के बारे में अधिक जानकारी के लिए जनता दरबार’(jantadrbar.blogspot.in)  पर दोबारा तशरीफ लाइए।


सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

कलम छोड़कर लैपटॉप थामने तक की कश्मकश

पत्रकारिता करते हुए महज पांच साल ही हुए हैं। प्रिंट मीडिया के कई संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। इस दौरान कई नई चीजें भी जानने-सीखने को मिली। कहीं खुलकर लिखने की आजादी मिलीतो कहीं चेहरा और विभाग के अधिकारियों को देखकर खबरें लिखने का फरमान भी मिलता था। फॉलो करना मजबूरी भी थीनहीं करता तो नौकरी से हाथ धो बैठता। इसलिए बॉस का आदेश हमेशा सर-आंखों पर रखना होता था। इस बीच मैंने डिजिटल मीडिया में एंट्री की। कोई अनुभव नहीं था। एकदम शून्य था। ऑफर लेटर मिलने के बाद कई लोगों को बताया कि अब मैं अखबार में नहींबल्कि मोबाइल और लैपटॉप में दिखाई दूंगा। कई लोगों ने तो सुनते ही विरोध किया। इतने अच्छे से नौकरी चल रही है। डिजिटल मीडिया में जाकर कुछ नहीं होगा। जो नाम हैवह भी खत्म हो जाएगा। वहां से अगर प्रिंट मीडिया में एंट्री करना चाहोगेतो संभव नहीं होगा। सभी की बातों को सुनने के बाद मेरा भी दिमाग काम नहीं कर रहा था। आखिर करूंतो करूं क्या। बीच मझधार में फंस गया था। लेकिन हिम्मत जुटाकर मैंने डिजिटल मीडिया की दुनिया में कदम रख दिया। कुछ दिनों तक वाकई उन सभी लोगों की कही बात याद आती थीलेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गएवैसे-वैसे मेरे अंदर हिम्मत आती गई। सही बताऊं तोदोस्तों प्रिंट मीडिया की दुनिया का अलग मजा है और डिजिटल मीडिया का अलग। मौका मिलेतो एक बार जरूर काम कर के देखिएगा। आपको खुद  खुद पता चल जाएगा। वैसे बता दूंमेरे साथ अभी प्रिंट मीडिया के जैसे अनुभव डिजिटल मीडिया में नहीं पेश आए हैं। नए तजुर्बों के साथ आपसे जनता दरबार पर नए टॉपिक के साथ फिर मुलाकात होगी।


गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

विश्वविद्यालय परीक्षा में बैठेंगे गणेश भगवान

भले शेयर बाजार गोते लगाएबाजार चरमरा कर गिरनेवाला होदिवाली में लक्ष्मी-गणेश की पूजा करीब-करीब हरेक हिंदूवादी परिवारप्रतिष्ठान में जोर-शोर से होता है। गणेश चतुर्थी में तो पूरा महाराष्ट्र ही गणेश के रंग में रंग जाता है। पर इन दिनों बिहार के मिथिलांचल के शान कहे जाने वाला मिथिला यूनिवर्सिटी जो हुआ है उससे सभी सन्न हैं। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है गणेश भक्ति का प्रभाव है या बीजेपी-नितिश सरकार का गठबंधन का भगवान के ओर कुछ ज्यादा ही झुकाव या फिर परीक्षा व्यवस्था की क्वालिटी जांच करने का अनोखा तरीका -- यूनिवर्सिटी प्रशासन ने तो गणेश भगवान को ही परीक्षा में बिठाने की ठान ली है। हाल ही में यूनिवर्सिटी प्रशासन ने परीक्षा के लिए जो एडमिट कार्ड जारी किया वहां पर अभ्यर्थि के जगह पर भगवान गणेश का सजीव फोटो लगा दिया और उनके हस्ताक्षर भी गणेश के नाम से करवा लिए। जिन विधार्थि के नाम से एडमिट कार्ड निकला है वे भाई परेशान होकर मारे फिर रहे हैं कि बिना बताए यूनिवर्सिटि ने उनका भगवान गणेश के साथ गठबंधन तो करवा दिया लेकिन परीक्षा में अब जाएगा कौनकहां से लाए गणेश भगवान कोहम सभी मिथिला यूनिवर्सिटी पूर्व छात्र जो त्रिवर्षीय बीए की डिग्री को चार साल में लेकर निकलेमिथिला यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस कारगुजारी को लेकर काफी हलाकान एवं परेशान हैं और अपनी सारी संवेदनाएं इस छात्र को समर्पित करते हैं। क्योंकि हमारा तो यूनिवर्सिटी ने सिर्फ एक साल जाया किया लेकिन पता नहीं इस छात्र के कितना समय चला जाएगा। कई लोग तो कहते हैं कि भगवान को पाने में कई युग लग जाते हैं। पता नहीं क्या होगा इस भाई का? “ वैसे भी हमसे जो पहले लोग-बाग लालू डिग्री में यूनिवर्सिटी में परीक्षा दिए थेवो तो घरे ले जाकर कॉपी लिखे पर पता नहीं हमारे समय का हुआससुरा सीएम आर्टस में सेंटर था एको गो विधार्थि को चिटे नहीं ले जाने देता था। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस पर अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा की चूंकि एडमिट कार्य आउट सोर्स किया गया था इसलिए ऐसा हो गया। हम इस मामले को दिखवाते हैं। हम आपकी बात से सहमत हैं- “आउट सोर्सिंग न बहुते बेकार चिज हैं उधर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप परेशान हैंछत्तीसगढ़ में रमन सिंह और ई यूनिवर्सिटी में बेचारा ई परिक्षार्थि “प्रशासन-सुशासन बाबु पर सोचिए बेचारे इस भाई का क्या हुआ होगा। क्या यूनिवर्सिटी प्रशासन को इन्हें मुआवजा नहीं देना चाहिएपर मिलेगा नहीं। ये तो बिहार हैं आप तो जानते हीं शिक्षा व्यवस्था के साथ सबसे खतरनाक एक्सपेरिमेंट यहीं होता है। शायद इसलिए यहां कभी गौतम बुद्ध को ज्ञान मिल जाता था तो कभी घर में ही कापी ले जाकर परीक्षा देने का चलन था। भाई अब इस राज्य में मामला एक कदम और आगे निकल गया अब गणेश जी को आकर परीक्षा देना पड़ रहा है। उनको मजबूरी में साईन भी करना पड़ा है....ये प्रभु यहां को तो भगवान ही मालिक.....जय गणपती बप्पा मोरया

सौजन्य – Avdhesh Mallick

नोट – इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैंइस लेखक में दी गई किसी भी सूचना की ‘जनता दरबार’ उत्तरदायी नहीं है. 

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

न बोलने की आजादी और न ही लिखने की

पत्रकारों को बोलने की आजादी नहीं है... सच लिखना तो जुर्म माना जाता है... ऐसे में बताओ भला न कुछ बोल सकते हैं और न ही लिख सकते हैं... यह कैसी आजादी है... सोमवार को पत्रकारों ने रायपुर प्रेस क्लब से राजभवन तक शांति मार्च निकाल आवाज बुलंद की...  शांति मार्च में प्रदेश भर के पत्रकार साथी सम्मिलित हुए। देश भर में पत्रकारों के ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं। हाल ही में बीजापुर से एक वायरलेस सन्देश लीक हुआ है। जिसमें रिपोर्टिंग के लिए गए पत्रकारों को मरवा देने के निर्देश दिये जा रहे हैं। इस वायरलेस सन्देश के सामने आने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी चिंतित हो उठी है। पत्रकार एकजुटता का संदेश दिया गया। शांति मार्च में 300 से अधिक पत्रकार अपनी इसी चिंता और अपने साथियों की सुरक्षा की मांग को शांति मार्च निकाला गया और शामिल हुए।


रविवार, 1 अक्टूबर 2017

रायपुर का नाम फिर हुआ रोशन

बधाई हो… रायपुर का नाम फिर से रोशन हुआ है। रायपुर का स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट देशभर में कस्टमर सेटिस्फेक्शन के मामले में एक बार फिर से पहले स्थान पर रहादेश के 53 एयरपोर्ट को पीछे छोड़ते हुए रायपुर एयरपोर्ट ने अपनी यह जगह बनाई। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड की हाल ही में जारी सर्वे रिपोर्ट में रायपुर एयरपोर्ट को कस्टमर्स ने सुविधाओं के मामले में सर्वश्रेष्‍ठ बतायारायपुर एयरपोर्ट के नाम से पहचाने जाने वाले इस एयरपोर्ट का नाम 24 जनवरी 2012 को स्‍वामी विवेकानंद एयरपोर्ट किया गया था स्‍वामी विवेकानंद ने अपनी किशोरावस्‍था में दो साल रायपुर में बिताए थे और उसी की याद में इसका यह नामकरण किया गया

डर सा लगता है कुछ लिखने में


डर सा लगता है कुछ लिखने में। सोचता हूं अगर मैं कुछ लिखता हूं और उसमें कोई गलती हो जाती है तो आप क्या कहेंगे? यही बोलेंगे न कि देखो इसको लिखना भी नहीं आता है और चला है ब्लॉग लिखने। पर मैं आपको बता दूं मुझे आपके बातों का जरा सा भी अफसोस नहीं होगा, क्योंकि मुझे अपनी गलती जानने और उसको सुधारने का एक सुनहरा मौका मिलेगा। वैसे मैं आपको पहले ही बता देता हूं कि मैं हिन्दी का जानकार तो नहीं हूं, पर फिर भी लिखना चाहता हूं। लिखने को अनगिनत टॉपिक है। मैं सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक के डेली रूटीन को भी लिखूं तो मुझे बहुत मजा आएगा। आप का पता नहीं, पर कोशिश करुंगा कि आपको भी पढ़ने में मजा आए। मेरे इस ब्लॉग पर आप सभी का दिल से स्वागत है। आज(01 अक्टूबर 2017) से लिखने के सिलसिला का श्रीगणेश करने जा रहा हूं। 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

अमिताभ का ख़त नातिन नव्या और पोती आराध्या के नाम

पिछले दिनों ऐश्वर्या राय की अगली फिल्म 'ऐ दिल है मुश्किल' के टीज़र लॉन्च के बाद कुछ इस तरह की खबरें मीडिया में छाई रहीं कि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में रणबीर कपूर के साथ अपनी बहू के हॉट सीन को देख नाराज हैं। हालांकि, यह बात कितनी सही है और कितनी गलत, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन अब अमिताभ ने अपने खानदान की बेटियों के लिए कुछ ऐसे शब्द लिखे हैं, जो उन्हें बेझिझक आगे बढ़ने और अपने दम पर जिंदगी जीने के लिए प्रेरणास्रोत साबित होंगे।
तुम दोनों के नाजुक कंधों पर बेहद अहम विरासत की जिम्मेदारी है। आराध्या, अपने परदादा जी डॉ. हरिवंश राय बच्चन और नव्या अपने परदादा जी श्री एच.पी. नंदा की विरासत संभाल रही हैं। तुम दोनों के परदादा जी ने तुम्हें मौजूदा सरनेम दिया है, ताकि तुमलोग इस प्रतिष्ठा, उपाधि और सम्मान को सेलिब्रेट कर सको। तुम दोनों भले ही नंदा या बच्चन हो, लेकिन तुमदोनों लड़की हो...महिला हो! और चूंकि तुमलोग महिला हो इसलिए लोग अपनी सोच, अपना दायरा तुम पर थोपने की कोशिश करेंगे। वे तुमसे कहेंगे कि तुम्हें कैसे कपड़े पहनने चाहिए, कैसा व्यवहार करना चाहिए, किससे मिलना है और कहां जाना है। लोगों की धारणाओं में दबकर न रहना। अपने विवेक के बल पर अपने फैसले खुद करना। किसी को यह तय करने का हक न देना कि तुम्हारी स्कर्ट की लंबाई तुम्हारे कैरक्टर का पैमाना है। किसी को यह सलाह देने की अनुमति मत देना कि कौन तुम्हारे दोस्त होने चाहिए और तुम्हें किन लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए। किसी और वजह से शादी करने की जरूरत नहीं जबतक कि तुम खुद शादी के लिए तैयार न हो। लोग बातें करेंगे। वे काफी बेकार बातें करेंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हें हर किसी की बातें सुननी है। कभी भी इन बातों से परेशान न होना कि लोग क्या कहेंगे। आखिरकार सिर्फ तुम दोनों ही ऐसी हो, जिन्हें अपने किसी भी काम का नतीजा झेलना पड़ेगा, इसलिए किसी दूसरे को तुम्हारे लिए फैसला लेने का हक मत देना। नव्या- तुम्हारा नाम, तुम्हारे सरनेम की खासियत तुम्हारी उन मुश्किलों से नहीं बचाएगी, जो महिला होने की वजह से तुम्हारे सामने आएंगी। आराध्या- समय के साथ तुम इन चीजों को समझोगी। हो सकता है कि तब मैं तुम्हारे आसपास न रहूं, लेकिन मुझे लगता है कि जो कुछ आज मैं कह रहा हूं उस वक्त भी तुम्हारे लिए प्रासंगिक (उचित) रहेगा। यह मुश्किल हो सकता है, एक महिला के लिए यह दुनिया मुश्किल हो सकती है, लेकिन मेरा यकीन है कि तु्म्हारी जैसी महिलाएं इन चीजों को बदल सकती हैं। अपनी सीमाएं खींच पाना, अपनी पसंद रखना, दूसरों को फैसले से ऊपर उठकर सोचना भले ही आसान न हो, लेकिन तुम!...तुम हर जगह महिलाओं के लिए एक उदाहरण बन सकती हो। ऐसा ही करना और जितना मैंने अबतक किया है तुमलोग उससे कहीं ज्यादा करोगी और मेरे लिए सम्मान की बात होगी कि मैं अमिताभ बच्चन के नाम से नहीं, बल्कि तुम्हारे दादा और नाना के रूप में जाना जाऊं।

प्यार और स्नेह के साथ
तुम्हारे दादा जी और नाना जी